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Bihar News: मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलाने के नाम पर 28.30 लाख की ठगी, पथ निर्माण विभाग के सहायक अभियंता पर कार्रवाई
- Reporter 12
- 10 May, 2026
बिहार पथ निर्माण विभाग के सहायक अभियंता राजेश्वर कुमार दास पर मेडिकल कॉलेज में दाखिला कराने के नाम पर 28.30 लाख रुपये की ठगी और चार्जशीट की जानकारी छुपाने का आरोप प्रमाणित हुआ। विभाग ने एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने की सजा दी।
PATNA/आलम की खबर: बिहार के पथ निर्माण विभाग में पदस्थापित एक सहायक अभियंता पर मेडिकल कॉलेज में दाखिला कराने के नाम पर लाखों रुपये की कथित ठगी करने और विभाग से गंभीर आपराधिक मामले की जानकारी छुपाने का आरोप प्रमाणित होने के बाद विभागीय कार्रवाई की गई है। विभाग ने अभियंता राजेश्वर कुमार दास के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाते हुए उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दी है। यह कार्रवाई उस समय हुई जब विभागीय जांच में पाया गया कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला और न्यायालय में दाखिल आरोप पत्र की जानकारी जानबूझकर विभाग को नहीं दी गई थी।
बताया जा रहा है कि राजेश्वर कुमार दास पहले राष्ट्रीय उच्च पथ प्रमंडल, गुलजारबाग में कनीय अभियंता के पद पर कार्यरत थे। वर्तमान में वे राष्ट्रीय उच्च पथ अंचल, पटना में सहायक अभियंता (अनुश्रवण) के पद पर तैनात हैं। उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने अपने साले के साथ मिलकर एक छात्रा को मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने का भरोसा देकर भारी रकम की वसूली की। मामला सामने आने के बाद पीड़ित पक्ष ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद जांच शुरू हुई।
पूरा मामला जहानाबाद की रहने वाली दीक्षा आर्या से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि मेडिकल कॉलेज में नामांकन कराने के नाम पर उनसे कुल 28 लाख 30 हजार रुपये लिए गए। जब दाखिला नहीं हुआ और पैसे वापस नहीं मिले तो पीड़ित पक्ष ने कानूनी रास्ता अपनाया। इसके बाद पटना के रूपसपुर थाना में वर्ष 2022 में प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस ने मामले की जांच की और पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया।
विभागीय दस्तावेजों के अनुसार अभियंता राजेश्वर कुमार दास को इस पूरे प्रकरण की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने विभाग को इसकी आधिकारिक सूचना नहीं दी। नियमों के मुताबिक किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने अथवा चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति में विभाग को सूचित करना आवश्यक होता है। आरोप है कि अभियंता ने यह तथ्य छुपाकर सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन किया।
मामले के खुलासे के बाद पथ निर्माण विभाग ने 12 अगस्त 2025 को उनके खिलाफ आरोप पत्र गठित करते हुए स्पष्टीकरण मांगा था। जवाब में अभियंता ने दावा किया कि उन्हें अपने खिलाफ दर्ज मामले और न्यायालय में दाखिल आरोप पत्र की जानकारी नहीं थी। हालांकि विभागीय जांच में यह दलील टिक नहीं सकी। जांच के दौरान ऐसे तथ्य सामने आए जिनसे स्पष्ट हुआ कि उन्हें पूरे प्रकरण की जानकारी थी और पुलिस स्तर पर उनसे पूछताछ भी की गई थी।
सूत्रों के अनुसार जांच में यह भी सामने आया कि मामला बढ़ने पर शिकायतकर्ता को सात लाख रुपये का चेक भी दिया गया था, लेकिन वह बैंक में क्लियर नहीं हो पाया। इस तथ्य ने विभागीय जांच को और गंभीर बना दिया। विभाग ने माना कि अभियंता ने न केवल आपराधिक मामले की जानकारी छुपाई, बल्कि अपने पद की गरिमा के अनुरूप आचरण भी नहीं किया।
जांच रिपोर्ट में आरोपों को प्रमाणित मानते हुए विभाग ने राजेश्वर कुमार दास पर “संचयी प्रभाव के बिना एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने” का दंड लगाया है। इसका अर्थ यह है कि निर्धारित अवधि तक उनकी एक इंक्रीमेंट रोकी जाएगी, हालांकि इसका स्थायी प्रभाव भविष्य की वेतन गणना पर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद विभागीय कार्रवाई को एक गंभीर प्रशासनिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
इस कार्रवाई के बाद सरकारी विभागों में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। प्रशासनिक हलकों में माना जा रहा है कि विभाग अब सेवा नियमों के उल्लंघन और आपराधिक मामलों को छुपाने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपना रहा है। खासकर ऐसे मामलों में जहां आम लोगों से ठगी या धोखाधड़ी जैसे आरोप जुड़े हों, विभाग अपनी छवि बचाने के लिए कठोर कार्रवाई करने के मूड में दिखाई दे रहा है।
वहीं इस पूरे प्रकरण ने मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलाने के नाम पर चल रहे अवैध नेटवर्क और दलाल तंत्र को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बिहार समेत कई राज्यों में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां छात्रों और अभिभावकों को मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य पेशेवर कोर्स में दाखिले का झांसा देकर लाखों रुपये की ठगी की जाती है। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि लोग यदि बिना आधिकारिक प्रक्रिया के किसी व्यक्ति के भरोसे एडमिशन की कोशिश करते हैं तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रोफेशनल कॉलेज में दाखिला केवल अधिकृत काउंसलिंग और निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से ही कराया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति विशेष के दावे या निजी संपर्क के भरोसे मोटी रकम देना जोखिम भरा साबित हो सकता है। यही वजह है कि शिक्षा विभाग और पुलिस समय-समय पर लोगों को सतर्क रहने की सलाह देती रहती है।
फिलहाल पथ निर्माण विभाग की कार्रवाई के बाद यह मामला फिर चर्चा में आ गया है। अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि आपराधिक केस की न्यायालय में आगे क्या स्थिति बनती है और भविष्य में विभाग इस तरह के मामलों पर कितना सख्त रवैया अपनाता है।
सरकारी पद की गरिमा और जनता का भरोसा
सरकारी नौकरी केवल वेतन और पद का नाम नहीं होती, बल्कि यह जनता के विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक भी होती है। जब किसी सरकारी अधिकारी पर ठगी, धोखाधड़ी या अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को छुपाने जैसे आरोप लगते हैं, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं उठता, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। पथ निर्माण विभाग के सहायक अभियंता पर मेडिकल कॉलेज में दाखिले के नाम पर लाखों रुपये लेने और विभाग से चार्जशीट की जानकारी छुपाने का मामला इसी चिंता को सामने लाता है।
आज शिक्षा, विशेषकर मेडिकल और प्रोफेशनल कोर्स में दाखिले को लेकर अभिभावकों और छात्रों के भीतर भारी दबाव है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर कई लोग “संपर्क”, “सेटिंग” और “गारंटी एडमिशन” के नाम पर अवैध कमाई का रास्ता बना लेते हैं। दुखद बात यह है कि जब ऐसे आरोप किसी सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति पर लगते हैं, तो लोगों का भरोसा और अधिक टूटता है। आम जनता यह उम्मीद करती है कि सरकारी अधिकारी नियम और ईमानदारी का पालन करेंगे, लेकिन यदि वही लोग नियमों को छुपाने लगें तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इस मामले में विभाग द्वारा कार्रवाई किया जाना जरूरी कदम माना जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि केवल एक वेतन वृद्धि रोक देना पर्याप्त संदेश देता है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में सख्ती इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी अपने पद का गलत इस्तेमाल करने की हिम्मत न कर सके।
समाज के लिए भी यह घटना एक चेतावनी है। मेडिकल कॉलेज या किसी भी बड़े संस्थान में दाखिले के लिए शॉर्टकट और निजी दावों पर भरोसा करना खतरनाक साबित हो सकता है। किसी भी स्थिति में केवल आधिकारिक प्रक्रिया और वैध काउंसलिंग व्यवस्था पर ही विश्वास करना चाहिए। वरना मेहनत की कमाई और भविष्य दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।
सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और जनता का भरोसा तभी मजबूत होगा, जब जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी दिखाई दे।
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